Friday, 8 August 2025

प्रिय युगल

 

तुम्हारी सादगी ही है सबसे बड़ा धन,
नहीं देखा तुम्हारा-सा कोई भी जन।
सब में अलग, सबसे निराला,
तुम्हारा धैर्य – एक अमूल्य हवाला।

हर रिश्ते को तुमने दिल से निभाया,
हर मोड़ पर अपनों का साथ निभाया।
तुम्हारी समझदारी, वो गहराई भरी,
जैसे शांत नदी, पर अंतस में लहरें तरी।

तुम्हारी मासूमियत में है कुछ खास,
सच्चाई ही बनती तुम्हारी पहचान की आस।
तुम्हारे जैसी आत्मा दुर्लभ है जहां में,
तुम चमकते हो इस भीड़ भरी राह में।

तुम हो सफल क्योंकि दिल से सच्चे हो,
कभी न थकते, बस प्रेम से पक्के हो।
महादेव और मातरानी की कृपा बनी रहे यूं ही,
तुम रहो सदा मुस्कुराते, जीवन हो मधुर बंसी।


Tuesday, 5 August 2025

keku नानू की दोस्ती

 keku नानू की दोस्ती

Keku का नाना से लगाव कोई आम बात नहीं है…

हर दिन की सुबह नाना की गोद से शुरू होती थी- वो हँसी, वो खिलखिलाहट, वो नज़रों में चमक… जैसे पूरी दुनिया ही वहीं सिमट आई हो।

नाना के साथ खेलना, बातें करना, उनके चेहरे को निहारना.. ये सब keku की छोटी-सी दुनिया का सबसे प्यारा हिस्सा है।

लेकिन अब, जब से नाना दूर हुए हैं… यानी लखनऊ

keku का चेहरा जैसे चुप हो गया है।

न हँसी है, न खेल… जैसे मन के भीतर कुछ खाली-सा हो गया हो।

खाने में भी वो दिलचस्पी नहीं बची, आँखें हर पल जैसे ढूंढती हैं - "नाना कहाँ हैं?"

वो मासूम दिल अब भी समझ नहीं पाता कि जो हर पल साथ था, वो अचानक दूर क्यों हो गया।

कभी दरवाज़े की तरफ देखता है, कभी नाना की तस्वीर छूता है… और चुपचाप उदास हो जाता है।

keku बस अपने नाना को मिस कर रहा है , बहुत ज़्यादा, बहुत गहराई से।

इतनी छोटी उम्र में भी इतना गहरा जुड़ाव हो सकता है, ये देखना एक माँ के लिए भावुक कर देने वाला अनुभव है।

कभी-कभी वो सिर्फ एक इंसान नहीं होता… वो किसी के लिए पूरी दुनिया होता है...

जैसे नाना, हमारे keku की पूरी दुनिया बन चुके है।"


Tuesday, 16 July 2019

इश्क मुश्किल है..
काफी मुश्किल है...
उबर खाबर पड़ाव है..
जिस पर चलना नंगे पांव है..
ठोकर तो काफी लगेगी..
तुम हर ठोकर पर हाथ कसके थाम लेते हो तो बात कुछ और होगी..
हां मैं मानता हूं कि इश्क जाहिर करने में मैं थोड़ा कच्चा हूं..
मगर इश्क है, तुमसे हैं,बेहद है, लो सरेआम कहता हूं।

Thursday, 11 July 2019




जैसे-जैसे बचपन खत्म हुआ, दूरियां बढ़ी,
थोड़ी जिम्मेदारियां बढ़ी, थोड़ी मजबूरियां बढ़,
बदल गए रोज के चार झलक उसके
महीनों की एक मुस्कान में,
वो कानों में फुसफसाना उसका,
जान डाल देता था जो जान में,
अब तो महीनें बीत जाते हैं
एक दूसरे को देख नहीं पाते हैं,
अनगिनत किस्से सुनाते थे उसे कहां,
अब किस्से अनगिनत उसके सुनाते हैं...

Sunday, 23 September 2018

पहली मुलाकात

याद है मुझे जब हमारी पहली मुलाकात हुई थी ..
अपने घर के आंगन में दूर खड़ी मैं उसी तरह तुम्हें देख रही थी  जिस तरह तुम मुझे देख रहे थे..

यूं तो सपनों में कई बार मिले थे हम,  पर पहली बार हमारी आंखें चार हुई थी जब हमारी पहली मुलाकात हुई थी..

हमारी नजर एक दूसरे पर पड़ी ही थी कि शर्मा उठे थे हम दोनों..

ना जाने कैसी हलचल थी जब हमारी पहली मुलाकात हुई थी..

 सांसी धीरे से सहर से रही थी रही थी दिल की धड़कन तेज सी हो रही थी..

जिंदगी की नई शुरुआत हुई थी जब तुम से पहले मुलाकात हुई थी..

फरवरी की थोड़ी सी गर्मी, और मेरी बेतुकी बातों को तुम्हारा यूँ घंटो झेल जाना.. खूबसूरत एहसास था वो जब तुमसे पहली मुलाकात हुई थी..

फिर बातों बातों में, उस लम्हे का गुज़र जाना,और फिर तुम्हारा विदा कह जाना, याद है मुझे हमारी आखिरी मुलाकात हुई थी..

पता नही फिर कभी हम मिलें या ना मिलें,
वो हमारी पहली मुलाकात.. याद है मुझे हमारी आखिरी मुलाकात हुई थी..

पर सालों बाद भी जब मैं जिंदगी के इन पन्नो को पलटूगीं इनमे तुम्हारा भी जिक्र होगा, कुछ यादें होगी,आँखों में नमी और होठों पर हँसी के साथ एक बात होगी,
कि याद है मुझे हमारी पहली और आखिरी मुलाकात...ruchi sharma. 

Saturday, 9 June 2018

  • क्या लिखूं 


तुम्हारे बारे में क्या लिखूं कम लिखू या ज्यादा लिखूं
हंसी लिखूं या अांसू लिखूं..
प्यार  लिखूं या गुस्सा लिखूं
पास लिखूं या दूर लिखूं
तुम्हारी मासूमियत लिखूं या अपनी चुलबुलाहाट लिखूं
तुम्हे अपना लिखूं या अपनी तुम्हे लिखूं
अपनी जलन लिखूं या तुम्हारा जलाना लिखूं
अपना रूट जाना लिखूं या तुम्हारा मनना लिखूं
तुम्हारा देखना लिखूं या अपनी नजरे झुकाना लिखूं
क्या लिखूं कितना लिखूं... सिर्फ तुम्हे लिखूं

Thursday, 5 April 2018

                                              एक कविता...



एक कविता जो हमने लिखनी शुरू ही कि थी
वो पूरी न हो सकी
लिखने से पहले काव्य की नायिका
नायक से नाराज हो गई
और वो कविता अधूरी हो गई

नायिका कठोर थी
निष्ठुर थी
तो नायक भी लक्ष्य पाने को आतुर था
कदम बढ़ाने के लिए भी वह चतुर था
फिर भी कविता अधूरी रह गई
कवि ने अभी हार नहीं मानी है
रार नहीँ मानी है।
नायिका उसकी थी
है और रहेगी

                                      थी एक एेसी कहानी..




वह भी थी एक ऐसी कहानी..
 जब उसके होठों में थी मेरी जुबानी...
 दिल में जो होता था ..
उसकी आंखों में थी वह निशानी ..
वह भी थी एक ऐसी कहानी
मेरे मन की बातें उसके होठों में लहराती.
वह भी कहता मैं तेरा और तू मेरी हो जाती
वह भी थी एक ऐसी कहानी...
हर पल मुझसे बातें करता मेरी ही बातों को सुलझाता..
मेरे उलझे बालों को हर वक्त वह सहलाता...

- ख्वाबों का साहिर

Monday, 21 December 2015




बच्चों में छिपे टैलेंट को धारदार बनाता है यह ‘चबूतरा’

chabutra

एक ओर जहां समाज नें धीरे- घीरे मानवता का लोप हो रहा है, वहीं दूसरी अोर हमें कुछ एेसे उदाहरण भी मिल जाते हैं, जिससे एक सभ्य और मिलनसार समाज की कल्पनाएं अंगड़ाइयां लेने लगती हैं। एेसी ही एक कल्पना को साकार करने के लिए राजधानी लखनऊ के महेश चंद्र देवा ने कदम बढ़ाया है। देवा गरीब और पिछड़े बच्चों को अपनी संस्था 'चबूतरा' थिएटर पाठशाला से जोड़ कर उनकी रुचि के अनुसार उन्हें प्रशिक्षित करते हैं और उनमें आत्मविश्वास जगाते हैं ताकि गरीबी, बेबसी और लाचारी जैसे शब्द उनकी प्रतिभा को न दबा सकें। 'चबूतरा' के माध्यम से इन गरीब तबके के बच्चों को एक नई पहचान मिली है।

देवा बताते हैं कि कुछ महीने पहले जब तनीषा वाल्मीकि  'चबूतरा थिएटर पाठशाला' से जुड़ी तो वह बहुत संकोची और चुपचाप  रहने वाली लड़की थी। रंगमंच के संस्थापक महेश चन्द्र देवा बताते हैं, तब तनीषा उसके बारे में पूछा जाता था तो वह चुप हो जाती थी। आज वह 50 लोगों के समूह के सामने अपनी बात रख सकती है। यहीं नहीं उसे बेस्ट एक्टिंग का अवॉर्ड भी मिल है। उसके अंदर एक्टिंग कि कला थी अौर उसकी इस कला को हमने अपने 'चबूतरा थिएटर' से पहचान दी।

chabutra

वहीं दिया चौधरी की चित्रकला में रुचि है, उसकी रुचि के अनुसार हम उसे ड्राइंग प्रतियोगिता में मौका देते हैं। आकाश नाम का एक लड़का है जो डंस बहुत अच्छा करता है साथ ही एक्टिंग भी बहुत अच्छा कर लेता है। इस तरह अलग- अलग बच्चों में अलग- अलग बच्चों में  अगल- अलग प्रतिभा देखने को मिलती है।

धीरे- धीरे बच्चों में काफी हद तक बदलाव आया। देवा कहते हैं कि हमारी कोशिश यहीं रहती है कि हमें बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार उनकी  प्रतिभा को निखारें। साथ- साथ हम बच्चों को लेखन कला में भी मजबूत करते हैं। कविता, निबंध और कहानियां कैसी लिखी जाती हैं इसका भी बोध करवाते हैं।

रंगमंच इस समय चार से 14 बरस के 30 से ज्यादा बच्चों को जिंदगी जीना सिखा रहा है और उसने कई बच्चों के जिंदगी में भी एेसा ही फर्क पैदा किया है। बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाना उन्हें सिखाई जाने वाली महात्वपूर्ण बातों में से एक बिंदु है। यह संस्था चुपचाप लखनऊ के कुछ निम्म आय वाली कॉलोनियों के बच्चों की जिंदगियों में रंग खिला रही है।

देवा कहते हैं कि कुछ लोग हमारे साथ और हैं जो निस्वार्थ भाव से हमारे साथ काम करते हैं जैसे गायक के मनीष त्रिपाठी हैं जो बच्चों को सुर संगीत सिखाते हैं। अमर पाल जो जाने- माने कलाकार हैं वो बच्चों को मॉडलिंग सिखाते हैं। रिचा आर्य कथक की गुरु हैं।

समसामयिक मुद्दों पर होती है चर्चा


chabutra

अब यह इस समूह के साथ प्रोफेशनल डांसर्स और थिएटर आर्टिस्ट के जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं जो बच्चों को सही तकनीक से रूबरू करवा सकें। समसामयिक मुद्दों का ज्ञान और सामुदायिक महात्व के मुद्दों पर चर्चा सत्रों की खासियत है। वे कहते है अक्सर बच्चे उन विभिन्न मुद्दों की तैयारी करके आते हैं जिन पर उन्हें चर्चा करनी होती है। आगे अब हम उन्हें लखनऊ महोत्सव के रंगमंच के लिए तैयार कर रहे हैं इसमें हम लखनऊ की खोई हुई पहचान को एक नाटक के तौर पर दिखाएंगे।

आत्मसम्मान जगाना ही लक्ष्य है

अब यह पाठशाला धीरे-धीरे अपने कार्यक्रम की रूपरेखा बना रहा है। अब तीन अलग- अलग बैच में 30 से ऊपर बच्चे हैं जो जिंदगी का सबक सीख रहे हैं। देवा कहते है उनका लक्ष्य समाज के उपेक्षित वर्ग में आत्मसम्मान जगाना है और आपसी भाईचारे को बढ़ाना है। युवाओं को प्रेरित करने के लिए उन्होंने बाल- संवाद करवाए।

देवा आशा जताते हैं कि अभी हम संसाधनों  की कमी से जूझ रहे हैं लेकिन ये बच्चे अगर अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो शायद आगे कोई मुश्किल नहीं आएगी।

http://up.patrika.com/lucknow-news/chabootra-theatre-pathshala-teach-poor-children-4901.html

Thursday, 29 May 2014

राजधानी में बढ़ता लिव इन रिलेशनश्पि का के्रज 



जैस-जैसे युग बदल रहा है वैसे-वैसे समाज की जीवन की परिभाषा ही बदलती जा रही है। आज की युवा पीढ़ी अपने रिश्तों और शादी को लेकर किस हद तक भ्रमित है, किसी भी बंधन में बंधने से कितना डरती है, ये साफ नजर आता है। हर चीज को समझने के लिए उन्हें पहले उस चीज के बारे में अनुभव चाहिए।
 लिव इन रिलेशनशिप यानी सहजीवन। आपको याद होगा कि देश में इस विषय पर विवाद की शुरुआत दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू के उस बयान से हुई थी, जिसमें उन्होंने विवाह पूर्व सेक्स संबंधों को जायज ठहराया था और इसके फलस्वरूप तमिलनाडु में काफी हो-हल्ला हुआ था। लेकिन बावजूद इसके लिव इन रिलेशन शिप का के्रज पूरे देश में बढ़ता जा रहा है। जिससे हमारी राजधानी भी अछूती नही हैं। यहां भी लोग दूसरे शहरों की तरह खुलेआम लिव इन रिलेशनशिप को अपना रहे हैं। कालेज से लेकर जॉब करने वाले युवक-युवती इस रिश्ते को लेकर बड़े ही संजीदा है। हालांकि हर रिश्ते की तरह अभी यह रिश्ता भी अपवादों की भ्ोंट चढ़ रहा है। शहर में लिव इन रिलेशन की हकीकत को बयान करती रुचि शर्मा की यह रिर्पोट ...
केस 1
हजरतगंज में रहने वाले एक मल्टीनेशनल कंपनी के इंजीनियर आयुष सिंह पर एक युवती ने लिव-इन रिलेशनशिप में धोख्ो के आरोप लगाए हैं। पीड़िता के दावे के मुताबिक वे दोनों पहले मोहब्बत के वादे कर साथ रहे लेकिन एक अन्य महिला के कारण उनका ये रिश्ता टूट गया। पीड़ित युवती हजरतगंज में ही एक फाइनेंस कम्पनी में काम करती है।
केस 2
 लिव इन रिलेशनशिप में रह रही प्रियंका शुक्ला कहती हैं कि वह पंजाब की रहने वाली हैं और यहां पर पढ़ाई के लिए आई हैं। वह कहती हैं कि जब मैं यहां आई तो रूम का खर्च अधिक था ऐसे में किसी के साथ रूम श्ोयर करना था, तो मुझे लगा कि दोस्त के साथ रहने में क्या बुराई है। आज हम दोनो बहुत खुश है। हां कई बार कुछ बातों को लेकर हमारे बीच झगड़ा हो जाता है। लेकिन हम एक दूसरे की केयर भी बहुत करते हैं।
केस 3
कानपुर निवासी एक युवक की पुलिस में भर्ती होने के बाद हजरतगंज में तैनाती मिली। राजधानी निवासी एक लड़की और सिपाही की फोन पर बातें होने लगी। इसके बाद वह दोनों साथ में रहने लगे। इसी दौरान महिला को पता चला कि सिपाही ने महिला थाने में ही तैनात एक महिला सिपाही से शादी रचा ली है। इस पर पीड़िता भड़क गई, उसने जमकर विरोध जताया। हालांकि मामला खाकी से जुड़ा होने की वजह से महिला आज भी गुहार लगा रही है।

केस 4
 गोमतीनगर में रहने वाले सीए दीपेंद्र गुप्ता कहते हैं कि वर्तमान में वह और उनकी एक सहकर्मी दो साल के लिव इन रिलेशन में रह रहे हैं। अगर उन दोनो की अच्छी निभेगी तो वे इस रिश्ते को आगे बढ़ाएंगे, नही तों समय पूरा होने पर वे अलग हो जाएंगे। हालांकि अभी तो वे एक दूसरे को अच्छे से समझ रहे हैं। सीए दीपेंद्र मूलत: छत्तीसगढ़ और उनकी सहकर्मी केरल की रहने वाली है।
शहर में लिव-इन रिलेशनशिप के बढ़ते मामले
महिला थाने में हर महीने दो से तीन केस लिव इन रिल्ोशनशिप में धोख्ो के दर्ज हो रहे हैं। बीते साल 3० से अधिक केसेज आए थे। महिला थाना प्रभारी शिवा शुक्ला बताती हैं कि राजधानी में भी लिव इन रिलेशन शिप का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। युवक-युवतियां सभी बिदांस होकर इसे अपना रहे हैं। जिससे इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। वर्तमान में अन्य मामलों के मुकाबले 4० पसेर्ंट से अधिक मामले लिव-इन रिलेशनशिप के दर्ज हो रहे हैं। वह कहती हैं कि लिव इन रिलेशनशिप में अधिकांश वे युवतियां या महिलाएं पीड़ित होती है जिनके पार्टनर कहीं बाहर से होते है या फिर वे स्वयं दूसरी जगह से आयी होती हैं। आज युवक ही नही अध्ोड़ भी लिव इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों का फायदा उठा रहे हैं, क्योंकि कई बार पीड़िताएं यही शिकायत लेकर आती है कि फलां आदमी उनके साथ इस रिश्ते में इतने दिनो से झूठ बोलकर रह रहा है। जबकि घर पर उसके बीवी-बच्चे सब हैं।



क्या सोचती है युवा पीढ़ी
वर्तमान युवा पीढ़ी लिव इन रिलेशनशिप जैसे संबंधों के प्रति अत्याधिक आकर्षित दिखाई दे रही है। इसके पीछे उनका तर्क यह है कि विवाह के बंधन में बंधने से पहले एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझ लिया जाए तो वैवाहिक जीवन में ताल-मेल बैठा पाना और आसान हो जाता है। हालांकि हमारा परंपरावादी समाज महिला और पुरुष को विवाह से पहले साथ रहने की इजाजत नहीं देता कितु अब हमारे युवाओं की मानसिकता ऐसी सोच को नकारने लगी है जो उन्हें किसी भी प्रकार के बंधन में बांध कर रख पाए। इसीलिए युवा 'लिव इन’ में जाने से बिलकुल नहीं हिचकिचाते।
 लिव इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों में उन लोगों की रुचि होती है, जो भारतीय मूल्यों और संस्कृति में विश्वास नहीं रखते। परिवार की जिम्मेदारियों या संस्कार का नामोनिशान तक नहीं होता है। लिव इन रिलेशनशिप का चलन महानगरों में अधिक देखने को मिलता है। अब इसे बड़े शहरों में भी मान्यता मिल गई है। जिसे निश्चित रूप से उन युवाओं का समर्थन है, जो उसमें विश्वास रखते हैं हालांकि मान्यता मिलने या न मिलने से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि सही और गलत समाज में पहले से ही मौजूद है। आज युवा लिव इन रिलेशनशिप को सही मानते हैं वजह ये है कि कई मौकों पर यह देखने में आता है कि महिलाएं और पुरुष जब प्रेम संबंध में पड़ते हैं तो उन्हें लगता है कि विवाह से पहले एक साथ रहना बहुत जरूरी है। वे सोचते हैं कि एक-दूसरे के साथ को लेकर सहज हो जाने से आगामी जीवन बिना किसी परेशानी के काटा जा सकता है।
दुष्प्रभाव
हम इस बात को कतई नकार नहीं सकते कि लिव इन जैसे संबंधों के टूटने का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। हमारा समाज एक ऐसी महिला को कभी सम्मान नहीं दे सकता जो विवाह पूर्व किसी पुरुष के साथ एक ही घर में रह चुकी हो। ऐसे हालातों में संबंध जब टूटता है तो उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वहीं लिव इन में संलिप्त रह चुका पुरुष, जो हमेशा से ही महिलाओं की अस्मत से खेलना अपना अधिकार समझता आया है, की गलती को कोई महत्व ना देकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
 महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अपने संबंधों के प्रति अधिक संजीदा और भावनात्मक लगाव रखती हैं। इसीलिए लिव इन संबंध के टूटने का प्रभाव केवल उन महिलाओं पर ही पड़ता है जो परंपरावादी सोच वाली, आर्थिक तौर पर सेटल या अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, बल्कि यह उन महिलाओं को भी अपनी चपेट में ले मानसिक रूप से आहत करता है जो मॉडर्न और आत्म-निर्भर होती हैं। हालंकि कई ऐसी महिलाएं भी हैं जो अपने कॅरियर को प्राथमिकता देते हुए शादी जैसी बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से बचना चाहती हैं, लेकिन ऐसे में उन महिलाओं की मनोदशा को नहीं नकारा जा सकता जो किसी बहकावे में आकर ऐसे झूठे रिश्तों की भेंट चढ़ जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की राय


सर्वोच्च न्यायालय द्बारा 'लिव इन रिलेशनशिप’ के समर्थन में की गई टिप्पणी के बाद एक बार फिर 'परिवार’ नामक सामाजिक संस्था के अस्तित्व पर बहस छिड़ गई है। विदेशी संस्कृति का अंधाधुंध अनुसरण कर रही हमारी युवा पीढ़ी को इस टिप्पणी के जरिए एक और बहाना मिल गया है।
 भारत जैसे परंपरावादी देश में जहां आमतौर पर आबादी का बड़ा हिस्सा भगवान राम के 'एक पत्नी सिद्धांत’ को ही आदर्श मानता है, रामनवमी की पूर्व संध्या पर आई सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी उसके गले नहीं उतरी।
 सवाल यह है कि अगर हम आधुनिकता के नाम पर इन रिश्तों को अमली जामा पहनाते भी हैं तो युगों से सहेजी गई भारतीय संस्कृति और संस्कारों का क्या होगा? इस मुद्दे पर जब बात की विभिन्न वर्ग के लोगों से तो चौंकाने वाली प्रतिक्रिया सामने आई...
पहले भी रहे हैं ऐसे रिलेशंस
प्राथमिक विद्यालय कि शिक्षक प्रज्ञा श्रीवास्तव ने कहती हैं कि हमारे समाज में इस तरह की रिलेशनशिप धीरे-धीरे सामने आ रही है। यह नई बात भी नहीं है। सदियों से हमारे यहां इस तरह के रिलेशन्स मेंटेन होते रहे हैं। हालांकि इन्हें किसी भी नजरिए से सही नहीं ठहराया जा सकता।
भारतीय समाज में बढ़ावा नहीं मिलेगा
नेशनल कालेज कि छात्रा सुप्रिया चौरसिया का कहना है कि लिव इन रिलेशनशिप में उन लोगों की रुचि होती है जो भारतीय मूल्यों और संस्कृति में विश्वास नहीं करते हैं। जबकि इस कॉन्सेप्ट में परिवार की जिम्मेदारी या संस्कार का नामोनिशान तक नहीं होता। भारत में भी कुछ लोग इसमें रुचि रखते हैं लेकिन भारतीय समाज में इसे बहुत ज्यादा बढ़ावा नहीं मिलेगा।
गलत क्या है
लखनऊ विश्वविद्यालय से बी कॉम कर रही अनविका श्रीवास्तव का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी युवाओं के लिए सुकून भरी है। पहले भी इस तरह के रिश्ते दबे-छुपे मेंटेन होते थे। आज खुले दिमाग से सोचने की आवश्यकता है। न्यायालय द्बारा लिव इन रिलेशनशिप के समर्थन पर बवाल उठने का प्रश्न ही नहीं है। इसमें गलत क्या है।


अपनी-अपनी नैतिकता
फैशन डिजाइनिंग कर रहे शुभम पाण्डेय का कहना है कि इस तरह के संबंधों को सामाजिक स्वीकारोक्ति मिलना चाहिए। कानूनी उलझनों के कारण यह संबंध उजागर नहीं हो पाते हैं। जहां तक सवाल नैतिकता का है, वह व्यक्तिगत मामला है। जरूरी नहीं कि सभी के लिए नैतिकता के मायने समान हों।
झेलना पड़ता है विरोध
बीटेक छात्र मुकेश धामी कहते है कि इस तरह के रिलेशंस को लंबे समय तक मेंटेन करना मुश्किल होता है, साथ ही आपको समाज का विरोध भी झेलना पड़ता है। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल रही हैं। महानगरों में किसी लड़की का अकेला रहना इतना आसान नहीं होता, ऐसे में किसी पुरुष साथी की आवश्यकता होती ही है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि दोनों पार्टनसã एक-दूसरे को समझें और स्वयं पर काबू रखें।
महिलाएं समझती हैं भावनाएं
सरकारी कर्मचारी महेश शर्मा कहते हैं कि महानगरों में इस तरह के रिलेशनशिप आम है। फ्लैट्स के महंगे किराए और अन्य परेशानियों के चलते युवा इसे प्राथमिकता देते हैं। किसी पुरुष के साथ साझा रहने से बेहतर होता है किसी युवती के साथ रहा जाए। महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कहीं अधिक विश्वसनीय, भावनाओं को समझने वाली होती हैं।
अपना-अपना नजरिया
रियल स्टेट कंपनी में कार्यरत शिवानी कहती हैं कि व्यक्ति का अपना एक नजरिया होता है। लिव इन रिलेशनशिप का मसला भी ऐसा ही है। देश हो या विदेश न सभी लोग लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं। सभी को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का हक है। 

Wednesday, 28 May 2014

  1. चेहरे के साथ सपने झुलसाता तेजाब 



'विनोदिनी के पिता को पैसे उधार देने के बाद, राजू की नीयत विनोदिनी पर थी वह उससे शादी करना चाहता था। मासूम विनोदिनी के इनकार करने पर उसने उसे तेजाब से नहला दिया।
 विद्या के माता-पिता ने जब उसकी शादी स्थगित कर दी, तो उसके मंगेतर ने उसके चेहरे पर तेजाब उड़ेल दिया।
 इकतरफा प्रेम में सिरफिरे आशिक का प्रेम पत्र न स्वीकार करने की सजा अर्चना ठाकुर को ऐसी मिली की आज उसका खूबसूरत सा चेहरा तेजाब की आग में बुरी तरह से जल गया है। ये मामले तो महज बानगी मात्र है। आज देश भर में न जाने ऐसी कितनी लड़कियां हैं जिनके सपने पल भर में चूर हो गए हैं। एक पल में उनकी जिंदगी से सारी खुशियां काफूर हो गईं। आज वे शरीर से जिंदा तो हैं लेकिन आत्मा से वह उसी दिन मर गई थीं जिस दिन उनके साथ यह अन्याय हुआ था। वे समाज व कानून से बस एक ही सवाल कर रही हैं कि आखिर मेरा कसूर क्या था? ’
 आजकल महिलाओं पर तेजाब फेंकने की घटनाएं बराबर देखी जा रही हैं। इसको देखते हुए केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने का विचार किया और गृह मंत्रालय ने इसके लिए भारतीय दंड संहिता में संशोधन लाने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्ताव के अनुसार तेजाब फेंकने वाले को दस साल की कैद और दस लाख रुपये जुर्माना लगाने का प्रावधान है। सरकार के काम की गति को देख कर हम अंदाजा लगा सकते हंै कि आने वाले पांच छह सालों में ये कुछ संशोधनों के साथ तब आनन-फानन में पास करा कर लागू कर दिया जायेगा जब इस अपराध का आंकड़ा आसमान छूने लगेगा और यह रोज की बात हो जाएगी। महिला संगठन और कुछ एनजीओ उस कानून को पास कराने के लिए आन्दोलन करेंगे हो हल्ला मचाएंगे कुछ बवाल भी होगा पर तब तक न जाने और कितनी लड़कियों का जीवन इस घटिया मानसिकता के कारण कि ए गए इस अपराध से बर्बाद हो चुका होगा ।
क्यों फेंकते हैं तेजाब
 अक्सरएसिड अटैक से जुड़े कई मामलो में मुख्य कारण बेवफाई होता है। बेवफाई कर दी तो तेजाब डाल कर जिस्म जला दिया। लड़की ने हां नहीं बोला तो तेजाब डाल दिया। कुछ मामले तो ऐसे देख्ो जाते हंै जहां लड़की के घरवालों द्बारा दहेज न मिला तो ससुरालवालों ने लड़की पर तेजाब फेंक दिया। सुनने में अब ऐसी खबरें कितनी मामूली सी लगती हैं कि फलां लड़की पर फलां लड़के ने तेजाब फेंक दिया। पर क्या कभी किसी ने इस बात का अंदाजा लगाया है कि ये तेजाब महज महिलाओं के शरीर को ही नहीं बल्कि उन्हे मानसिक रूप से भी आघात पहुंचाता है। इसके साथ ही उनका सामाजिक जीवन भी खत्म कर देता है। वे बेचारी जिंदगी भर दूसरों का मोहताज बन कर रही जाती है। जिंदगी में फिर से आत्मविश्वास के साथ समाज का सामना करना काफी मुश्किल होता है। किसी लड़की या महिला पर तेजाब से हमला करना, सबसे क्रूर हमला माना गया है। तेजाब एक ऐसा हथियार है जिसे अमूमन चेहरे पर डाला जाता है, जिसका मकसद महज सिर्फ उस इंसान का चेहरा खराब करना होता है जिसके लिए दिल में नफरत होती है। इस हमले की ज्यादातर शिकार महिलाएं होती हैं। एसिड अटैक एक ऐसा भयावह अपराध है जो की इंसान को एक असीम दर्द लेकर जीने को मजबूर कर देता है, जीने का मकसद खत्म कर देता है। एक ऐसे अंधेरे में डाल देता है जिसकी रोशनी का कोई ठिकाना नहीं होता। इस निर्दयी अपराध को अंजाम देने के लिए एचसीएल और सलफ्यूरिक जैसे एसिड का प्रयोग किया जाता है। ऐसी स्थिति देखकर हम नारी सशक्तिकरण की बात कैसे कर सकते हैं? एसिड अटैक के बहुत कम ही मामले ऐसे हैं जो लोगों की नजर में आ पाते हैं।
 घटनाओं के आंकड़े
दुनिया के करीब बीस देशों में हर वर्ष करीब 15०० लोग एसिड अटैक के शिकार होते हैं और इनमे 8०% औरतें होती हैं। जिनमें से 7०% की उम्र 18 साल के आस-पास होती है। दक्षिण एशियाई देशों में ही ऐसे कुकृत्य ज्यादा देखने में आते हैं और इनमे प्रमुख भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान , अफगानिस्तान, कम्बोडिया आदि हंै। इन देशों में एक वर्ष में करीब 1०० एसिड अटैक के मामलों की रिपोर्ट दर्ज होती है। इसके अलावा ऐसे कितने मामले दब जाते हैं जिनकी कोई गिनती नहीं होती है।
 एक सर्वे के मुताबिक भारत चौथा ऐसा देश है जहां महिलाओं को सबसे ज्यादा खतरा है। चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग की हों। शादी के लिए इनकार किया, तलाक के लिए आगे बढ़ी या प्रेमी के प्रेम प्रस्ताव को ठुकराया तो ज्यादातर ऐसे मामले में महिलाओं पर एसिड अटैक किया गया। दहेज, जमीन-जायदाद व बिजनेस के विषय में भी महिलाओं पर एसिड फेंका गया। इनमें से 34 फीसद मामले ऐसे थे जिसमें युवती ने शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। पिछले कुछ सालों में एसिड अटैक के मामले इस कारण भी बढ़े हैं क्योंकि यह सस्ता व आसानी से सुलभ था बजाय किसी और हथियार के।
 लम्बी न्यायिक प्रक्रिया
 भारत में भी देश के एक कोने से दूसरे कोने तक आज अनेक महिलाएं इस जघन्य अत्याचार की शिकार हो रही हैं। जो आज अपना एक खूबसूरत सा चेहरा खो चुकी हैं। जिनकी बस कहानियां ही बाकी रह गईं हैं। हमारे कानून में तेजाब फेंकने वाले अपराधियों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया भी बहुत लम्बी है, और फैसला आने तक अपराधी किसी की जिन्दगी तबाह कर खुद आराम से सामान्य जीवन बिताते रहते हैं । जबकि पीडिèता न सिर्फ असहनीय दर्द झेलते हुए एक जिदा लाश की तरह हो जाती है बल्कि उसके चरित्र पर भी उंगलियां उठाई जाती हैं। तेजाब सिर्फ चेहरे को ही नहीं झुलसाता बल्कि पीड़ितों के लिए एक-एक दिन जीना मुश्किल कर देता है। अक्सर उनकी आंखों की रौशनी भी चली जाती है। उन्हे कान से सुनाई नहीं देता और उनके हाथ-पैर भी ठीक से काम नहीं करते हैं।


क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट 


महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे तेजाब हमले को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने इस पर चिता जताई है। इस मामले में तेजाब हमले की पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर तेजाब बिक्री पर रोक लगाने और तेजाब हमले के अपराध में कड़ी सजा का प्रावधान करने की मांग की है। एसिड अटैक के बढ़ते मामलों के कारण पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अहम फैसले किए। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे हमले में दोषी पाए गए लोगों को जमानत नहीं मिलेगी। पीडिèता को बड़ा मुआवजा देने व उसके पुनर्वास के भी निर्देश जारी किए गए। यहां तक कि तेजाब की खुलेआम बिक्री रोकने का निर्देश भी दिया गया। अब तेजाब की बिक्री के लिए विक्रेता को तेजाब खरीदने का सही कारण भी बताना होगा। विक्रेता को ग्राहक का नाम, पता व टेलीफोन नंबर भी रिकार्ड में रखना होगा। तेजाबी हमले की शिकार ज्यादातर गरीब परिवारों की युवतियां थीं, जिनके पास अपना इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं थे। सरकार को अब इनके प्रति मानवीय होना होगा। उन्हें निर्धारित मुआवाजा राशि तो देनी ही है। उनका इलाज भी कराना होगा। समाज के लोगों को भी इनके प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। इससे इनकी जिदगी के कुछ दर्द कम होंगे और जीवन जीने की एक नई उम्मीद जगेगी।
जुर्माना और मुआवजा
 विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस अपराध के लिए कम से कम दस साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा और दस लाख रुपए जुर्माने के प्रावधान की सिफारिश की थी। आयोग ने जुर्माने की राशि पीड़ित को देने का प्रावधान कानून में ही करने का सुझाव दिया था। इसके लिए उसने कई देशों के कानूनों की छानबीन की थी। आयोग का मत था कि तेजाब के हमले के पीड़ितों के लिए ही नहीं बल्कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों से पीडिèत के पुनर्वास के लिए भी केंद्र, राज्य और जिला स्तर पर मुआवजा बोर्ड बनाने की आवश्यकता है। भारतीय दंड संहिता में शामिल धारा 326 (क) का संबंध किसी व्यक्ति द्बारा जानबूझ कर किसी पर तेजाब फेंककर उसे स्थायी या आंशिक रूप से कुरूप बनाने या शरीर के विभिन्न अंगों को गंभीर रूप से जख्मी किए जाने से है। यह एक संज्ञेय और गैर जमानती अपराध है जिसके लिए कम से कम दस साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा हो सकती है। इसके साथ ही दोषी पर उचित जुर्माना भी किया जायेगा और जुर्माने की रकम पीड़ित को देने का इसमें प्रावधान है।

कानून काफी नहीं है
इस तरह के अपराधों को हम केवल कानून बना कर नहीं रोक सकते है या ये कहें कि किसी भी सामाजिक समस्या को केवल कानून बना कर नहीं रोका जा सकता है। दहेज़ कानून , कन्या भ्रूण हत्या ,बाल विवाह और घरेलू हिसा कानून बना कर हम पहले ही देख चुके है। इससे अपराध पर कोई लगाम नहीं कसा जा सका है। उसके बाद एक लड़की पर तेजाब फ़ेक कर उसे मौत से भी बदतर जीवन देने वाले के लिए क्या दस साल की कैद काफी है? किसी लड़की के लिए इस तरह की घटना मौत से भी बड़ी है। ऐसा करने वालों पर तो हत्या का मुकदमा चलाना चाहिए और उसे लड़की के जीवित रहने पर कम से कम आजीवन कारावास और उसकी मृत्यु होने पर उसे सीधे फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए। फिर कानून बना देने से काम नहीं चल सकता है। जरूरी है कि उसे कड़ाई से लागू किया जाए अपराधी को जल्द से जल्द पकड़ा जाए और उसे सजा भी दिलाई जा सके। लेकिन वर्तमान में हमारे देश की कानून व्यवस्था को देख कर मुमकिन नहीं लगता है कि ऐसा हो पाना संभव है?
अपराधी की मानसिकता पर चोट की जाए
अब यहां सवाल यह है कि इन घटनाओं को कैसे रोका जाए? ऐसे में इसके लिए जरूरी है कि अपराध की मानसिकता पर चोट की जाए। अभी तक जो भी केस सामने आए हैं उन सभी में तेजाब फेंकने के पीछे वजह यही थी कि लड़की का चेहरा ख़राब करके उसके जीवन को बर्बाद कर दिया जाए। उसे शारीरिक नुकसान के साथ ही एक बड़ी मानसिक चोट दी जाए। जिससे वो कभी भी बाहर ना आ सके।
 सरकार जो प्रस्ताव ला रही है उसमे भी दस लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है जो निश्चित रूप से लड़की के लिए होगा ताकि वह अपना इलाज करा सके। कितु जब अपराधी इस जुर्माने को भर ही नहीं सकेगा तब इसके लिए जरूरी है कि सरकार पीड़िता की प्लास्टिक सर्जरी कराए ताकि पीड़िता को उसका पुराना चेहरा मिल सके। यह सर्जरी भी आधुनिक सर्जरी होनी चाहिए। ताकि अपराधी के तेजाब फेंक कर उसका चेहरा बरबाद करने का मकसद पूरा न हो सके । जिससे इस तरह की कोई भी बात किसी के दिमाग में न आए। 

Monday, 24 February 2014


‘सुदंर चेहरा, ओजस्वी व्यक्तित्व ·भी उसकी  पहचान थी।
वाला  चश्मा, नकाब  और अभिशप्त जीवन अब उसका  वजूद है।’

किसी  सन कि  दॢरदे के  तेजाबी हमले कि  शिकार  हुई ये मासूम कलियां  इस ·दर कुचली  जा चुकी  हैं कि इनके  जीने का  मकसद  खत्म हो चुका  है। यंत्रणा और पीड़ा से भरा जीवन जीने को  मजबूर ये लड़किया  मृत्यु मांगने को  मजबूर हैं। पिछले कुछ  दशको  में गैंग रेप कि  तरह तेजाब भी औरतों के  खिलाफ ए· अचू· हथियार बन चुका  है।‘छेड़छाड़ का  विरोध किया, प्यार ठुकराया , शादी से इंकार  किया , इगो को  ठेस पहुंचाई, यहं तक  कि  इगनोर भी किया  तो तेजाब डाल कर  झुलसा दो। झुलसे चेहरे और जख्मों के  साथ जिन्दगी भर रोएगी और अफसोस ·रेगी कि  क्यों लिया पंगा।’हाल ही में अदालत द्वारा तेजाबी हमलों पर कुछ कठोर  नियम बनाने से आस तो जगी है लेकिन  ये नियम तेजाबी हमले रोकने में कितने कारगर होंगे ये कहना कठिन है। सवाल उठता है कि  क्या सुप्रीम कोर्ट के  निर्देश के  बाद तेजाब खुलेआम बिकना बंद हो जाएगा? क्या आई कार्ड द्वारा खरीदा गया तेजाब किसी को  नहीं जलाएगा? क्या तेजाब हमला गैर जमानती होने से ऐसे हमले रुकेगे? पीडि़ता को  मुआवजा बस तीन लाख। ये तीन लाख क्या जिन्दगी भर कि  बेबसी और जख्मों पर मरहम लगा पाएंगे। गौर कीजिए पांच दस लाख तो इलाज में ही खर्च हो जाते हैं। शादी ब्याह, बच्चे, नौकरी सभी ख्बाव को  तिलांजलि मिलने के  बाद आखिर कोई जिए भी तो किस सहारे। ऐसी उत्पीडऩ के  चलते अर्चना अपनी कहानी बयान करती है ।
  मैं अर्चना एक छोटे से शहर फरीदाबाद कि  रहने वाली,मेरे शहर से बड़े मेरे सपने थे। अपने मां बाप की  सबसे प्यारी और लाडली हूं । मेरे पैदा होने से लेकर मुझमें समझदारी आने के  बाद से मैंने उनके  आंखो में अपने लिए हजार सपनें देखे और उन सपनों को  पूरा करने का  ख्याल मेरे मन में हमेशा से रहा । यहा सोचती थी कि  एक  दिन सारे सपनों को खुद कि  मुठ्टी   में संजोग लूंगाी । करीबन तब १९ की  उम्र होगी मेरी, सहेलियो के  साथ स्कूल  जाना पढऩा लिखना खेल खूद सव में सबसे आगे रहेती थी । अभी बस सपनों कि  दुनिया में पैर ही रखा था कि  उसकी नजर मुझ पर पड़ी और वो मुझे इस कदर पसन्द करने लगा कि  मेरी मर्जी जनना ही नहीं चाहा । यह एक  तरफा प्यार था । मेरी कभी गलती से भी उस पर नजर पड़ जाती तो मुंह फेर लेती थी । उसका मुझे बार बार डराना धमकाना, धीरे धीरे उसका  प्यार पागलपन में तब्दील हो गया । उसका  प्यार मेरे लिए खौफ बन गया । मैंने अपनी ये बात अपने गांव के  प्रधान से बोली अपनी गुहार लगाई पर कोई ठोस कदम नहीं उठा । दिन बीते गये पर अब वक्त कुछ  अलग मोड़  दिखाने वाला था । हाथ में स्कूल  बैग रोजाना कि  तरह स्कूल के  लिए निकल पड़ी । वो दिन हर दिन कि  तरह था पर वक्त आज बदला नजर आ रहा था उस शख्स ने मुझे पल भर में अन्धकार में डाल दिया था । उस तेजाब की  बौछार से मेरी चमड़ी ही नहीं मेरी जिन्दगी मेरे सपनें भी जला कर राख कर  डाले । उस पल से मेरी जिन्दगी थम गई मेरे सपने मेरा बचपन सब उस तेजाब के  धुंए के  साथ खत्म हो गया ।
  आज मेरी उम्र २४ साल कि  है समय तो चल रहा है पर वो दर्दना· घटना आज भी मैं अपने साथ ले·र चल रही हूं। दैनिक  क्रिया के  लिए मां बाप ही एक मात्र सहारा हैं। पीड़ा इतनी है कि  ज़मीन पर एड़ी नहीं रखी जाती। गर्दन से लेकर लोअर एबडोमन तक  दर्द और जलन बना रहता है। गर्मी का एक एक  क्षण मौत के  बराबर।  मेरा दर्द अब मेरे घरवालो के  लिए भी असहनीय हो चुका है। वो भले ही अपना दर्द का  जिक्र  न करे पर आंखे सब कहा देती है ।

  कानून में संंशोधन काफी संजीदा ओर गम्भीर मामला है । इसकि प्प्रक्रिया या ऐसी बनाई जानी चाहिए ·कि विभिन्न कानून के  सन्दर्भ में आम आदमी कि  प्रतिक्रिया  मिलती रहे । फीडबैक  के  आधार पर इसमें सत्त सुधार होना चाहिए । तभी कानून समाज के  अनुकूल बना रहेगा और लोगों को  वास्तवि· न्याय मिल सकेगा । आज नए कानून ने अपराधियों की  केवल सजा बढ़ाई है। इसमें तेजाब हमले कि  शिकार पीडि़ता कि  मदद के  लिए कोई प्रावधान नहीं है। पीडि़ता को ताउम्र बदसूरत चेहरे और ‘मनोवैज्ञानि· घाव’ के  साथ जीने के  लिए मजबूर होना पड़ता है। वे तेजाब हमले से निपटने के  लिए एक  अलग कानून की  मांग कर  रहे हैं, जिसमें सहजता से बाजार में बिक  रहे नाइट्रिक  और सल्फ्यूरिक  अम्ल को  नियंत्रित करने के  लिए भी प्रावधान हो। तेजाब हमले कि  पीडि़ता को  दीर्घकालिक  सर्जरी कि  जरूरत होती है। सरकार  कि  इसे प्रावधानों में जरूर शामिल करना चाहिए। अपराधी को खबर होनी चाहिए कि वह किसी कि  लड़की  जिंदगी तबाह कर के  सजा से नहीं बच सकता।

Thursday, 6 February 2014

आप  कि खास  हमारी  आस  , गिरती  साख 

वो दिन भी थे जब अन्ना अनशन में थे और केजरीवाल उनके सहयोगी तब केजरीवाल कि छवि एक आम यक्ति के रूप में थी। जिसने सब कि लड़ाई को कूद कि लड़ाई समझी और अकेले ही मैदान में निकलने कि सोची। पर आज अफ़सोस इस बात का है कि वो   जिस काम को करने के लिए निकले थे राजनीती में आ कर वे उसी रंग में ढलते नज़र आ रहे है । भ्रस्टाचार के खिलावफ आवाज़ उठा कर मुखमंत्री तो बन गए अब आप खुद को ईमानदार और दुसरो को भ्रस्टाचार साबित कर के कहीं आप प्रधानमंत्री बनने  कि तो नहीं  सोच रहे है ? बस  आपकी  चिंता  करते हुआ हम यही मनाएंगे  कि सता में में  आपका  पता सलामत  रहे . 

Tuesday, 28 January 2014

                        हर चाय की दुकान छोटू के नाम !


बचपन के वो हसीन पल याद करके, वो शरारते याद करके, आज भी चेहरे पर मानो मुस्कुराहट नहीं रूकती । न किसी तरह की चिन्ता न किसी तरह का तनाव और सभी जिम्मेदारियों से एकदम आजाद । हर बात में अपनी जिद्द करना चीज़े पसन्द आ जाना तो उसे हसिल करके ही रहना । वाह! क्या दिन थे वो बचपन के । पर क्या सभी का बचपन एक जैसा हो ऐसा जरूरी नहीं ।
       आज जब मैं उन बच्चो को सड़क पर काम करते हुये देखती हंू जिनकी उम्र में हम बिस्तर में ही खाना खाते थे आज  हमारी उसी उम्र के ही वो बच्चे रोटी पाने के लिए काम करते हैं। बाल मजदूरी की समस्या से आप अच्छी तरह वाकिफ होगें । कोई भी ऐसा बच्चा जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो और वह जीविका के लिए काम करे बाल मजदूरी कहलाता है । गरीबी, लाचारी,भूखमरी, माता पिता की प्रताड़ना के चलते बच्चे बाल मजदूरी की दलदल में फंसते जा रहे है । आज दुनिया में 215 मिलियन ऐसे बच्चे है जो 14 वर्ष से कम है और बाल मजदूरी का शिकार हो रहे है ।  जो समय हमारा किताबो यारो- दोस्तो, खेल खूद में बीता वही समय ऐसे बच्चो का बर्तन, झाडू- पूछें ,होटलो में सफाई, रिक्शा चलाने में बीत रहा है । भारत में यह स्थिति बहुत भयावह हो चला है । दुनिया में सबसे ज्यादा बाल मजदूरी भारत में है । 1991 की जनगणना के हिसाब से बाल मजदूरों का आकंडा 11.3 मिलियन था । 2001 में यह आकंडा बढ़कर 12.7 मिलियन पहुंच गया ।
       घर से बाहर निकलते ही हर दुकान ढाबे में आपको छोटू, राजू, मुन्नी मिलेंगे । कोई चाय के कप साफ करता कोई पूछें लगाते तो कोई रिक्शा चलाते । इसमें सबसे  बड़े दोषी हम खूद है।  बाल श्रम की चर्चा करते हुये हम बड़े आराम से उनसे चाय ले लेते है काम करवा लेते है । हम ही है जो इसे बढ़वा दे रहे है । उन बच्चो से काम करवाते वक्त कभी ये सोचा है कि इन बच्चे की उर्म में हमारे बच्चे कैसे थे? वो क्या करते थे ? नहीं सोचा होगा तभी तो इस अपराध को  बढ़ावा देने वाले हम ही है  और यह बात केवल बाल मजदूरी तक ही सीमित नहीं है , इसके साथ ही उन मासूमो के  साथ कई घिनोने काम  भी होते है । मेरे अनुमान से अगर 80% बाल मजदूरी है तो 50% उन बच्चो में शारीरिक प्रताड़ना के शिकार हो रहे है । बाल मजदूरी की उस स्थिति में सुधार लाने के लिए सरकार ने चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया जिसके तहत बाल मजदूरी को अपराध माना गया । यह तक की आज सरकार हर जगह  सरकारी विघालये खुले है । जिनमें 8वीं तक की शिक्षा अनिवार्य और निष्शुल्क कर दी लेकिन गरीबी बेबसी ने इसे निष्फल सबित कर दिया । उन बच्चो के मां- बाप इस वजह से उन्हे  आगे नहीं भेजते क्योंकि स्कूल जाने से परिवार की आमदनी कम हो जायेगीं ।
         बाल मजदूरी का सबसे बड़ा कारण है गरीबी । गरीबी के चलते मां बाप ऐसा कदम उठाते है । पर अगर वो पढेÞ लिखे नहीं है तो हम तो है । हर वो बच्चा जो अपने बचपन को खोकर बाल मजदूरी के दल दल में फंस रहा है  हम खूद उन्हें रास्ता दिखाये । सरकार द्वारा दी गई सेवायें (जैसे निशुल्क शिक्षा ) तक उन्हें पहुंचाये । और साथ ही साथ सरकार को भी इस विषय में गम्भीर रूप से सोचना होगा और ऐसे अपराध को रोकने के लिए सशक्त कानून और गरीबी दूर करने के लिए कुछ जिम्मेदारियां सरकार भी उठाये ।

Thursday, 14 November 2013

                          खुद को  बदलो …  शुरुवात तो करो!!



हमारे समाज  में  लव मैरिज  को क्यों नही एक्सेप्ट  कर पाते  भले  ही वो  करीना कपूर और  सैफ  अली खान  ही क्यों न हो।  यह  कहना  है आम  आदमी  का।  इस तरह  के विवहा  से  insecure  फील  करने लगता है।  इस  माध्यम  वर्गीय  आम आदमी  के मन में  अजीबो  गरीब  सा  डर  है  वह  असुरक्षित  है।  सहमा  हुआ है और अपना  जीवन  डर  डर  कर काट  रहा है।  उसे  इस  बात  का डर  होता है कि कहीं उसकी  बेटी प्रेम  विवाह  न कर  ले , घर से न भाग  जाये, गैर  मजहब  लड़के से विवाह   न कर  ले इसलिए  वह  समय -समय   पर अपनी बेटी को आगाह  करता है। यह अन्दर  से डरा  व्यक्ति  पूरी आत्मविश्वास  और दृढ़ता  से प्रेम का विरोध करता है।  समाज  के अधीन  होकर  सालो से उसकी गुलामी  कर  रहा है।   यह  आदमी अपने  इस काम  को जारी  रखना  चाहता  है।  वह  अपना डर  और असुरक्चित  होने का आहसास  अपनी  नयी पीढ़ी  को सौप  देना चाहता  है।   एक अच्छी  एजुकेशन  अच्छी पढाई  अच्छा पालन पोषण  सब  देना चाहता  है पर  नयी सोच  पैदा  करने  का मौका  नई पीढ़ी को  नही देना चाहता  है। एक  आम  आदमी कपडे तौर  तरीके हर चीज़  ज़माने  को लेकर  चल रहा है पर  जब समाज  उसे  सामना करने  का मौका आता  है तो  वह  अपनी नजरे  फेर  लेता है  । आज  का मानव आधुनिकता कि बाते  करता है पर क्या  सही  मायने  मे अगर  आधुनिकता  का मतलब जाने  तो केवल कपडे , बोल -चाल बदल   लेना  ही नही है  बल्कि  सोच में परिवर्तन  करना ही आधुनिकता  है, समाज  कि उन्नति  है।  पर ये  सब बनावटी  है अगर अप अपनी सोच  में परिवर्तन न ला पा  रहे है।  सोसाइटी  में  आए  दिन  हो रही  दहेज प्रथा  , घरेलु  हिंसा  शोषण  और हॉनर  किलिंग जैसे  मामले इनके विरोध  जताने  का एक जीता  उदहारण है।  क्यों  कई  घरो  में  हो रही शोषण  और मार पीट  इन पुरषो  कि चिंता  का  विषय  नही है ?  क्यों  अपनी गलतियों कि कोई सजा   निर्धारित नही   कि।  क्यों उन्हें  केवल आपत्ति  है प्रेम  विवाह से ! यही  एक कारण  है कि आज   लोग बढ़  रहे है तरीके बदल रहे है पर आज भी  देखा जाये तो समाज वही का वही सक्रिय  रहा गया।दूसरो में बदलाव दिखेने से पहले खुद के सोच में परिवर्तन लाना  जरूरी है। 

Tuesday, 17 September 2013

                 "शुद्ध  देशी रोमांस" का असर  युवाओ में 


अभी तक आपने  यश   राज  फिल्म की यादगार  प्रेम कहानियां  देखी  है   यश राज जी ने  कई  ऐतिहासिक  लव स्टोरी के साथ  ही कई यादगार जोडिया भी दी है  लेकिन जैसे जैसे युग बदला वैसे वैसे  परिभाषा  भी बदली  और साथ ही साथ यश राज की लव स्टोरीयों  में  भी बदलाव दिखने  मिले  हालहीं  में आई  यश राज जी की फिल्म "शुद्ध देशी रोमांस " में यश  जी ने आज की यंग जनरेशन  की सोच और उनके प्यार , शादी को  लेकर कन्फ्यूज्ड सोच सामने लाकर रख दिया  फिल्म की शुरुवात  से लेकर अंत तक यूथ के जीवन  की उन बातो और कमजोरियों  के बारे में पता चलेगा  जिनके  बारे में  पुराने  ज़माने  के लोग शायद सोच भी नही सकते।  आज की युवा पीढ़ी  अपने रिस्तो  और शादी लेकर किस हद तक कन्फ्यूज्ड है, किसी भी बंधन से बंधने   से कितना डरती है  हर चीज़  को समझने के लिए उन्हें पहले  उस चीज़  के बारे में experience चाहिए , इस फिल्म में जैसे  दिखाया  गया है "लिव इन रिलेशनशिप"  के बारे में , इसलिए  यूथ ने इस फिल्म को  पसंद  किया है  लिव इन रिलेशनशिप  जैसे चीजों  में उन लोगो की रूचि  होती है जो भारतीय  मूल्यों  और सांस्कृतिक  में विश्वास  नही रखते  और लिव  इन रिलेशनशिप इसी  का कांसेप्ट  है  परिवार  की जिम्मेदरिया या संस्कार  का नामोनिशान  तक नही  होता   अब इसका ट्रेंड  भारत में भी आ गया है लेकिन   समाज में इसे बहुत  अधिक  बढावा  नही मिला  लिव  इन रिलेशनशिप का चलन  महानगरो  में अधिक देखने  को मिल रहा है  जैसा  की अब इसे बड़े  शहरों  में मान्यता  मिल गयी है तो निश्चित  रूप से उन युवाओ का समर्थन  है जो इसमें  विश्वास  रखते है  हालाकिं  मान्यता मिलने या न मिलने से बहुत  अधिक फर्क  नही पड़ने  वाला है क्यूकि  सही  और गलत   समाज  में पहेले से ही मौजूद  है  पर आज कल के youngester  लिव  इन रिलेशनशिप को सही मानते है क्यूकि  अधिकतर मौको  पर यह  देखने  में आता  है  कि लोग शादी के बंधन में  बंधने  के बावजूद  एक दूसरे  के प्रति समर्पड  का भाव  अधिक  समय  तक नही रख पाते है इससे अच्छा  है की बेहतर  समय के आधार  पर वो लोग साथ रहे 
                                                               युवा पीढ़ी  अब बिना किसी  समझोते  , त्याग  और दायित्य  निर्वाहन  के उन्मुक्त  बंधनहिन   जीवन  जीना  चाहती  है अनेक  कानूनी  बाध्यताओ  के चलते  जहाँ  पुरुष  "विवाह " के नाम  से हिचकने  लगते है वही  महिलाओ  के लिए विवाह  एकतरफा    दायित्य का  निर्वाहन है  प्रशन यंहा  नही है की लिव  इन रिलेशनशिप  कितना सही  है या कितना  गलत  प्रशन  यह  है कि युवा  पीढ़ी  रिश्तो  के मायने  क्या समझती है ? यह तय  है कि  समाज के बाह्य  सुवरूप  में चाहे  कितना भी परिवर्तन  क्यों न हो जाए परन्तु   रिश्तो  को निभाने  के लिए प्रेम और समर्पड आवश्यक  है , भले  ही लिव  इन रिलेशनशिप को मान्यता मिल गयी हो पर हमारी परम्परा  और सांस्कृतिक  इसकी  इजाज्त  नही देता।  ऐसे  रिश्तो  का आगे  भविष्य  हो या न हो इसका  ठिकाना  भी नही होता है और इसमें सबसे  बड़ा नुकसान  लड़की का होता है , इसे अब चाहे  समाज की सोच कहे  या भारतीय  संस्कृति  , युवा  पीढ़ी को यह समझना होगा की शर्तो  पर टिके  रिश्तो  का जीवन अल्पहीन होता है ।  वह अधिक समय तक नही रहता है  

Monday, 26 August 2013

                                               आक्रोश 


एक  और  सामूहिक  दुष्कर्म।     मुंबई  में एक  फोटो जर्नलिस्ट  शिकार  बनी , 22 aug  को हुई  इस  घटना ने  एक  बार फिर पूरे देश में आक्रोश  और  शोक  की  भावना  जाग्रत  कर दी , पर सवाल यह उठता कि  क्या ऐसी  घटना मात्र खबर बन कर ही रहा जाएगी या इसके खिलाफ कोई सक्त कदम भी उठाया  जायेगा ? अब इसमें सरकार  को भी क्यों गलत दोषी करार दे हमारे असवेदनशील सरकार अपनी नीजी  ज़िन्दगी  के हेर- फेर से फुरसत  होकर यह सुनिश्चिय  नही कर पा रही है की इस तरह की घटना पर कैसे अंकुश लगाया जा सके , यह केवल दिखावा  कहे या ज़मीनी सच्चाई से परे बाते की महिलाओ को देवी का दर्जा दिया गया है।   पर आज वही देवी दुनिया पर बोझ  और समाज का शिकार बन गयी है ।  देश में हर साल दुष्कर्म के करीब 24,000  मामले दर्ज होते है जिसमे  से कई मामले माँ- बाप शर्मिदगी  के  कारण दबा देते है अक्सर दिखा जाता है की जब भी इस प्रकार की बड़ी घटना सामने आती है तो देश के लोग गुस्से से उबलने लगते है ।  इंसाफ  के लिए सड़क पर उतर आते है आन्दोलन करने लगते है धीरे धीरे समय बीतते ही आक्रोश नम पड़  जाता है ।
                      पर यह सबसे अफ़सोस की बात है कि दुष्कर्म की शिकार लडकियों के साथ ऐसे व्यवहार  किया जाता है जैसे मानो वे चरित्रहीन  और दुराचारी हो  । जबकि इसके विपरीत  दुष्कर्म करने वाले अधिकांश लोग खुले घूमते रहेते है , उन्हें सजा की न तो डर होती है  और न ही समाज का कोई शर्म , इससे पहले ऐसे ही एक  घटना जो भूले न भूल सकेगी 16 /dec /012  दिल्ली  की वो दर्दनाक घटना  । यह गुनहा भी गैंग रेप  का था ।  यह घटना इतनी दर्दनाक थी की पूरे देश को झिंझोर कर रख दिया, इस घटना को अंजाम देने के लिए लोग सडको पर उतर आये इंडिया गेट और देश के विभिन हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होते रहे।    इस घटना के बाद महिला की सुरक्षा को लेकर कानून सक्त हो गयी और सरकार ने ऐसी घटना दुबारा न होने का  भरोसा दिलाया परन्तु ऐसा लगता है कि ऐसी घटना न केवल लगातार होती रही ।  सच्चाई यह है की ऐसी घटना को रोक पाने में सरकार पूरी तरह से विफल रही है केवल सक्त  कानून बना देना ही सुरक्षा नही है दुष्कर्म जैसी संगीन अपराध को तब थक नही रोक जा सकता है जब तक इन गुनेगार को कड़ी से कड़ी सजा न मिल जाये ।  पर हम इसका पूरा दोष कानून और सरकार को भी कब तक दे ? कहते है जब बीज ही खराब हो तो फल तो खराब निकलेगा ही इस प्रकार अगर घर परिवार में शुरुवात से ही यह शिक्षा न दी जाती कि लड़का कुछ भी गलती करे चलेगा  लेकिन लड़की ऐसा नही कर सकती  । लडकियों को सिखाया ही यही जाता है कि मर्यादा  का पालन करे और समाज के रीति नीति के मुताबिक रहे ।  यह सामाजिक दोष का क्योंकि  हमारे  समाज में ही लड़के और लडकियों में भेद भाव है  यदि समाज और सरकार मिलकर ऐसी घटना के लिए सक्त कानून बनाये और तुरंत ऐसी संगन अपराध के लिए कड़े नियम कानून बनाये तो ऐसी घटना दुबारा अंजाम देने के लिए भी सोचेगी , सरकार एक्ट न करे बल्कि रियेक्ट करे। 

Monday, 29 July 2013

                                        ये कैसा मजाक  था  ?

आधुनिक समाज  का अभिशाप है गरीबी और उसमे  बदनसीबी  यह  है कि  गरीबी  को गरीबी न मानना , इसमें सरकार  ने गरीबी के अभिशाप  का मजाक़  उड़ाते  हुआ गरीबी की नई  परिभाषा  लिखी  है ,जिस  रकम  में  आदमी अपनी एक दिन की आवशयक  ज़रूरते  भी  पूरी  न कर सके , उस  व्यक्ति  को सरकार  गरीबी रेखा  से ऊपर  कर दे, हमारी  सर्कार सच्चाई  जानना  और समझना ही नही चाहती है , इतनी  महंगाई  के  बीच  कांग्रेस  का यहाँ कहेना की शहर  में प्रतिदिन 32 rs और गावं  में 25 rs  अधिक  खर्चा करने वाला  गरीब नही  है ,नई  देल्ही में  5 rs  और मुंबई  में  १२ rs  में  भरपेट  भोजन  उपलब्ध  है , यह  शब्द  गुस्सा  दिलाने से कम नही  है , इस  घिनोने  मजाक उड़ाने  के पीछे  एक ही कारण  हो सकता  है कि वे जमीनी  हकीकत  से  अनजान  है , वे ये भूल  गए है कि  वे 80 -90 के  दशक  में  नही  है ,इस  चलती मंहगाई में  शायद  एक आदमी  इस रकम  में एक टाइम  का भरपेट  का खाना  भी न खा  सके अन्य  जरूरते  तो बाद  की चीज़े है , अगर सच्चाई  रूप  से देखा  जाये तो यदि  आम  लोग पौष्टिक  भोजन  का  प्रबन्ध  करने  में  नाकाम  है और अपने  बच्चो  को उचित  शिक्षा  एवं  अन्य  बुनियादी  जरूरते  उपलब्द नही  करा प् रहे  है तो  वे गरीबी रेखा से नीचे  ही कहलंगे , बेहतर  यह  होगा कि  सर्कार इस  चीज़ को समझ ले और यह  सोचे  कि  महंगाई के इस  दौर  में आम जनता और विशेष  रूप से निधर्न  तबके  के लोगो  की अवश्यकताओ  की पूर्ति कैसे  हो ?

Saturday, 22 December 2012

kakrosh ki abhivaykt

शर्मसार   गयी  मै  ये सुनकर कि  हमारी  राजधानी  ..अरे !! माफ़  कीजियेगा हमारी नहीं बाल्त्कारियो   की राजधानी  delhi में चलती बस में  लड़की से सामुहिक  बाल्तकार  और गम्भीर  हालत हालत  में   उसे  छोड़  दिया , ये कोई  आम इन्सान  नहीं हो सकता , ये हवानियत  है , अब बात ये उठती  है की सरकार  कोई कदम  उठाये  तो क्यों  उठाये  ? भाई भाई ! क्या   तुम्हारी  बेटी है ? क्या वो तुम्हारी  बहेन  है ? या तुम्हारी  बीबी  है ?
तो क्यों उठाए कदम ?हम इन्सानों  की गिनती  में  थोड़ी  न आते है . अरे !! हेवान  है हम ! जो इतना सब देख  कर भी  काली  पठी  से आंख  बंद किये   हाथ  में इंसाफ  का तराजू  पकडे  खड़े है .. माफ़  कीजिएगा  मेरा उस  लड़की  से कोई खून  का सम्बन्ध   नहीं है , पर हां  इंसानियत   नाम से उसके दरद  को महसूस  करने की हिमत रखती  हु मै  , मै  एक आम जनता हू , उन करोड़ो  की आवाज  में  मेरी भी  एक आवाज है , जो उसके लिए इंसाफ  मांगने  के लिए  खाड़ी  है , सरकार  क्या देगी  सजा  , सरकार  के अनुसार  बलत्कार  करने  की  सजा  7 साल  है , तो भाई सहब !!इंतजार करो  की आपकी  बीबी  , लड़की  और बहन  का  बारी  कब आयेगी ?  हम लड़की है हमे भी  दो  जीने  का अधिकार  ? क्यों समय  की पावंदी  हमे  दी  जाती है ?यही अगर  माँ  ने  लड़के  के पैदा होते समझाया  होता तो  आज कोई  बलत्कार  जेसा  घिनोना  काम  न होता . अगर आज उन  6 जानवरों  को सजा-ए -मौत न दी जाएगी  तो इसी  तरह  और भी कई  जानवर  पैदा  होंगा ...
                               माँ  मै  तेरे आगन  आई , माँ  मै  खुहाली  लाई ,
                               जग  को सुंदर  बनाया , पर  आज जग  ने  ही मुझे  अभिशाप  बनय ............

Tuesday, 2 October 2012

sapne dikhne ke kimat hai bhai !!

  क्या नींद थी  सवेरे  5 बजे की  वो खिड़की से आने वाली  बहार की ठंडी हवाए   कोयल  की मीठी  आवाज़ और एक प्यारा सा सपना , मनो जनत  रुपी  सैर  हो गयी , सपनो से मनो उठने  का मन ही न करे , कभी कभी आचे सपने भी कम आते है ,उस नींद से अब उठने का मन ही न करे , फिर धीरे  से  माँ कमरे मे  आई  प्यारा सा हाथ सर  में  फेरा  वो हात तोह ऐसा लग रहा था  जैसे  मानो नींद की हावैया तेज हो गयी हो , फिर धीरे से माँ ने  कान  मी आवाज़  दी " बेटा अब उठ जा समय  हो गया है वो आवाज तो कान थक गयी ही नही  10 मिनट  के बाद  माँ का प्यार गुस्से मई  में बदल गया  और कहने  लगी " अब तो  उठ  जा  तेरा नास्ता कितने बार गर्म करू ? एक तो सिलेण्डर  के दम  असमान  छु रहे है और उपरे से तेरे सपनो ने महंगाई  मई आटा  गिला कर  रखा है , बस  फिर किस बात की धेर थी उससे वक्त  सपना टुटा नींद उठी और नास्ता सामने , थोड़ी  देर   के साथ   पेपर पढने   के  बाद  माँ की आवाज़े  फिर से कानो में गूंजी " जल्दी तैयार हो जा पापा के साथ  ही   जाना  बार- बार डीजल का खर्चा कौन देगा , माँ का भी खेना एक तरफ से सही  ही था ,  अब भाई   डीजल  के दम में  5 रुपये  की वृद्धि  ,  रसोई  गैस  के दम में  वृद्धि ,18 महीने में रीटेल में  एफ  डी आई  आदि  सर्कार ने फैसला तो कर लिया लेकिन  भाई साहब  क्या सर्कार हमे ये बतायंगी  की इससे  अब हम आम आदमी की आमदनी  कैसे  बढेगी , डीजल के दाम बढ़ने से सभी वस्तुओं  के दाम बढ़ जायेंगे  और इससे सर्कार की आमदनी  बढ़ेगी , सरकारी कर्मचारियों  का वेतन बढेगा , क्या इससे प्राइवेट  नौकरी  करने वालो को क्या  कोई फेदा मिलेगा ? हम खान जाये अब इस महंगाई में ये भी अब सर्कार ही बताये  . अब लगा की  माँ ने सही कहा था  की यहाँ  सपने दिखने  के भी कीमत  होती है .